SC/ST एक्ट में अग्रिम जमानत पर रोक बरकरार: सुप्रीम कोर्ट बोला– रिव्यू जरूरी नहीं, 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट में 2018 में किए गए संशोधनों की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ किया है कि एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर लगी रोक बरकरार रहेगी और इस फैसले पर दोबारा विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। 2020 का फैसला ही लागू रहेगाCJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट 2020 में ही 2018 के संशोधनों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रख चुका है। इसलिए अब इस फैसले की समीक्षा (रिव्यू) की कोई जरूरत नहीं है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “कानून के दुरुपयोग की शिकायतों को अदालतें मामले के तथ्यों के आधार पर देख सकती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि कानून को ही गलत ठहरा दिया जाए।”
याचिकाकर्ता की दलील: अग्रिम जमानत न देना ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’बृजभूषण सैनी द्वारा दायर इस याचिका पर एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर कानूनी रोक लगाना “उल्टा भेदभाव” (Reverse Discrimination) है, जिससे इस कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहती है। JPG+ 1दलील के दौरान ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ को समझाते हुए कहा गया कि यदि किसी एक वर्ग को विशेष कानूनी अधिकार या सुविधा दी जाती है, तो उससे प्रभावित होने वाले दूसरे वर्ग को यह महसूस होता है कि उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है। एडवोकेट जैन ने फर्जी मुकदमों और मुआवजे के नाम पर बांटे जाने वाले फंड की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
SC/ST एक्ट और 2018 के संशोधन का पूरा पृष्ठभूमिमार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए निर्देश दिया था कि FIR दर्ज करने से पहले अनिवार्य प्रारंभिक जांच की जाए। साथ ही, सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी से पहले सक्षम अधिकारी की अनुमति अनिवार्य की गई थी और विशेष परिस्थितियों में अग्रिम जमानत का प्रावधान दिया गया था। देशभर में विरोध और संसद का संशोधन: इस फैसले के विरोध में देशभर में प्रदर्शन हुए थे। इसके जवाब में संसद ने ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018’ पारित किया। धारा 18A की वापसी: संशोधन के जरिए एक्ट में धारा 18A जोड़ी गई, जिसने कोर्ट द्वारा अनिवार्य की गई प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले मंजूरी लेने की शर्तों को खत्म कर दिया। इसके साथ ही, अग्रिम जमानत पर लगी रोक को दोबारा पूरी तरह से बहाल कर दिया गया था।

