शहर के बीचों-बीच बने मौत के ‘जल-जलाशय’, 19 खुली खदानें दे रहीं हादसों को न्योता, फाइलों में दफन हुई 163 लाख की सुरक्षा योजना

कटनी। शहर के घने आवासीय और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीचों-बीच स्थित खुली खदानें अब नागरिकों के लिए सीधे तौर पर ‘मौत के कुएं’ साबित हो रही हैं। इन खदानों में वर्षा का गहरा पानी भरा हुआ है, लेकिन इनके चारों ओर न तो कोई तार फेंसिंग की गई है और न ही सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम हैं। स्थानिय निवासियों का दावा है कि इन खदानों के कारण अब तक दर्जनों लोग, विशेषकर मासूम बच्चे, असमय काल के गाल में समा चुके हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक लापरवाही और विभागीय उदासीनता का आलम यह है कि इतने बड़े खतरे के बाद भी जिम्मेदारों की नींद नहीं खुली है।हाल ही में आयोजित जिला स्तरीय जनसुनवाई में शिकायतकर्ता संदीप रजक ने कलेक्टर के समक्ष इस संवेदनशील और जानलेवा मुद्दे को उठाकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए हैं।

शहर में कहां-कहां फैली हैं ये 19 जानलेवा खुली खदानें?शिकायत में शहर के विभिन्न व्यस्त और घनी आबादी वाले वार्डों में स्थित 19 प्रमुख खदानों की सूची सौंपी गई है, जो बिना किसी सुरक्षा घेरे के खुली पड़ी हैं:भट्टा मोहल्ला (कच्चा सॉ मिल के पास): काली माता मंदिर के पीछे स्थित 2 खदानें।कब्रिस्तान के समीप: चौबे वार्ड स्थित खदान।एसीई जीएम बंगलों के पीछे: संवेदनशील क्षेत्र में स्थित खदान।ऑर्डिनेंस फैक्ट्री रोड: मुख्य मार्ग के पास स्थित खदान।दानव बाबा मंदिर: मंदिर के पास एवं ठीक पीछे स्थित खदानें।भीमराव चौक से मुक्तिधाम मार्ग: राहगीरों व स्थानीय लोगों के लिए खतरनाक खदान।नैन्सी स्कूल के पीछे: स्कूली बच्चों के लिए सीधा खतरा बनी 2 खदानें।बरगवां – माधवनगर मार्ग: मुख्य आवागमन मार्ग पर स्थित खदान।कच्छ सॉ मिल के पास: 2 खुली खदानें।पाठक वार्ड: रिहाइशी इलाके के पास खदान।बारडोली कॉलेज के पीछे: छात्रों और युवाओं की आवाजाही वाले क्षेत्र में खदान।कंचन खदान: गहरा पानी भरा होने से खतरनाक।श्मशान भूमि के पीछे: 2 खुली खदानें।

फाइलों में कैद सुरक्षा योजना: 2010 का आदेश और 163.34 लाख का बजट गायबयह मुद्दा केवल आज का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक उपेक्षा का एक लंबा इतिहास समेटे हुए है।16 साल पुराना आदेश: वर्ष 2010 में तत्कालीन एसडीएम द्वारा खदानों का सीमांकन करने, फेंसिंग कराने और चेतावनी बोर्ड लगाने के सख्त आदेश जारी किए गए थे, लेकिन 16 साल बीत जाने के बाद भी यह आदेश महज कागजों तक सीमित रहा।163.34 लाख का बजट: खदानों को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से 163.34 लाख रुपये का एक व्यापक प्रस्ताव तैयार किया गया था। लेकिन यह बजट और सुरक्षा योजना फाइलों से बाहर निकलकर धरातल पर कभी लागू ही नहीं हो सकी।इसके अतिरिक्त कई खदानों में अवैध भराव, अनाधिकृत कब्जों और कचरा डंपिंग की शिकायतें भी सामने आ रही हैं, जिस पर जिम्मेदार विभागों ने आंखें मूंद रखी हैं।

अब सवाल कार्रवाई का नहीं, सीधी जवाबदेही का हैजनसुनवाई में मामला पहुंचने के बाद कलेक्टर ने इस विषय पर त्वरित जांच व कार्रवाई का आश्वासन दिया है। हालांकि, आम नागरिकों का कहना है कि अब सिर्फ निरीक्षण, समीक्षा बैठकों या पत्राचार से काम नहीं चलेगा। नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि:भौतिक सत्यापन व सुरक्षा ऑडिट: सभी 19 चिन्हित खदानों का तत्काल भौतिक सत्यापन कर सुरक्षा ऑडिट कराया जाए।फेंसिंग व बैरिकेडिंग: सभी खदानों के चारों ओर मजबूत फेंसिंग, बैरिकेडिंग और चेतावनी संकेतक बोर्ड लगाए जाएं।बजट व आदेश की स्थिति स्पष्ट हो: 163.34 लाख रुपये की योजना का क्या हुआ और 2010 के आदेश के अवहेलना अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी, इसका पारदर्शी जवाब दिया जाए।

राजनीतिक दबाव नहीं, जनहित सर्वोपरि: आंदोलन की चेतावनीशिकायतकर्ता संदीप रजक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मुद्दा किसी राजनीतिक मंशा या दबाव के तहत नहीं, बल्कि आम नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा और सार्वजनिक भूमि के संरक्षण के लिए उठाया गया है। उन्होंने प्रशासन को कड़ा अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि समयबद्ध सीमा के भीतर खदानों की सुरक्षा को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आम जनता को साथ लेकर उग्र जिला स्तरीय जनआंदोलन किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।

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