विशेष रिपोर्ट: इंकलाब के अमर नायक—शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयंती पर देश भर में उमंग और जोश का माहौल
“दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वफा आएगी…”
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब-जब अदम्य साहस, उच्च कोटि के बौद्धिक चिंतन और मातृभूमि के प्रति सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले त्याग का जिक्र होता है, तो सबसे पहले जुबां पर एक ही नाम आता है—शहीद-ए-आजम भगत सिंह। आज 28 सितंबर को देश के महान क्रांतिकारी और अमर सपूत भगत सिंह की जयंती पूरे देश में अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और भव्यता के साथ मनाई जा रही है। आज पूरे देश में धूमधाम से उनका जन्मदिवस मनाया जा रहा है, और इस पावन अवसर पर देशभर के युवाओं में गजब का जोश और उत्साह देखने को मिल रहा है। उनके विचार और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा आज भी युवाओं की रगों में देशभक्ति की लहर दौड़ा रहा है।
बंगा गांव से उठा वह तूफान, जिसने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत
शहीद भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत (वर्तमान पाकिस्तान) स्थित लायलपुर जिले के बंगा गांव में एक देशप्रेमी सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह पहले से ही स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। घर में मिले इसी राष्ट्रीयता और बलिदान के माहौल ने बाल्यकाल से ही भगत सिंह के कोमल मन में देश को आजाद कराने की सुलगती चिंगारी को हवा दे दी थी।
जलियांवाला बाग के खून से सनी मिट्टी ने बदली तकदीर
वर्ष 1919 में हुए कुख्यात जलियांवाला बाग नरसंहार ने कम उम्र के भगत सिंह के जीवन को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया। उस समय उनकी उम्र मात्र 12 वर्ष थी। वे अपनी साइकिल छोड़कर मीलों पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे थे और वहां की खून से सनी मिट्टी को एक शीशी में भरकर अपने घर ले आए थे। उसी दिन उन्होंने उस पवित्र मिट्टी को साक्षी मानकर अंग्रेजों से देश को मुक्त कराने की भीषण प्रतिज्ञा ली थी।
शास्त्र और शस्त्र का अनूठा संगम
भगत सिंह केवल एक आक्रामक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के विचारक, लेखक और दार्शनिक भी थे। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से पढ़ाई के दौरान इतिहास, समाजशास्त्र और यूरोपीय क्रांतियों का गहन अध्ययन किया था। वे मानते थे कि क्रांति का अर्थ केवल खून-खराबा नहीं है, बल्कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था को बदलकर एक समतावादी समाज की स्थापना करना है। उन्होंने ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना कर युवाओं को एकजुट किया और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे को घर-घर तक पहुंचाया।
देश के लिए हंसते-h हंसते चूमा फांसी का फंदा
लाहौर में सांडर्स वध और दिल्ली सेंट्रल असेंबली में अंग्रेजों को बहरों को सुनाने के लिए धमाका करने जैसी घटनाओं के बाद भगत सिंह को उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु के साथ 7 अक्टूबर 1930 को मौत की सजा सुनाई गई। ब्रिटिश साम्राज्य इतना भयभीत था कि तय तारीख से 11 घंटे पहले ही, यानी 23 मार्च 1931 की शाम को ही तीनों अमर सपूतों को लाहौर जेल में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।
आज भी युवाओं के दिलों में धड़कते हैं भगत सिंह
आज उनकी जयंती पर गली-मोहल्लों से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक, हर तरफ भगत सिंह के विचारों की गूंज है। युवा मोमबत्तियां जलाकर, प्रभात फेरियां निकालकर और उनके सपनों के भारत—समानता, न्याय और स्वतंत्रता वाले राष्ट्र—के निर्माण का संकल्प ले रहे हैं। शहीद-ए-आजम का यह पावन दिन हर भारतीय को यह याद दिलाता है कि राष्ट्र सर्वोपरी है।
“प्रेरणा स्रोत:“प्रेमी, पागल और कवि एक ही चीज से बने होते हैं, और वह है- देशभक्ति।” — शहीद-ए-आजम भगत सिंह”












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