अब स्कूलों में खत्म होगी अंग्रेजी की अनिवार्यता,थ्री-लैंग्वेज’ फॉर्मूले में पढ़नी होंगी 2 भारतीय भाषाएं
नई दिल्ली/ देश के शिक्षा तंत्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन होने जा रहा है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत भाषाओं के चयन के नियमों में बड़ा संशोधन किया है। नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब स्कूलों में अंग्रेजी का अध्ययन आवश्यक नहीं रहेगा। इसकी जगह, विद्यार्थियों को ‘तीन भाषा फॉर्मूला’ के अनुसार कम से कम दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य होगा।
सत्र 2026-27 से लागू होगी व्यवस्था CBSE द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के मुताबिक, यह नई प्रक्रिया कक्षा 6 से शिक्षा सत्र 2026-27 से लागू की जाएगी। इसे वर्ष 2034 तक कक्षा 10 में पूरी तरह से लागू करने की योजना है। इस परिवर्तन का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं को महत्व देना और विद्यार्थियों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है।
क्या है नया ‘भाषा फॉर्मूला’ (R1, R2, R3)?
बोर्ड ने भाषाओं को तीन श्रेणियों में बांट दिया है: R1 (प्राथमिक भाषा): वह भाषा जो छात्र की मातृभाषा या स्थानीय भाषा है।
R2 (दूसरी भाषा): अनिवार्य रूप से कोई एक भारतीय भाषा (जैसे हिंदी, संस्कृत, मराठी आदि)। R3 (तीसरी भाषा): इसमें विद्यार्थी अंग्रेजी या किसी अन्य विदेशी भाषा (जर्मन, फ्रेंच आदि) का चयन कर सकते हैं, लेकिन यह अब वैकल्पिक होगी।
संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं को मिलेगा बढ़ावा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय के कारण संस्कृत सबसे प्रमुख विकल्प बनकर उभरेगी, क्योंकि ज्यादा से ज्यादा स्कूलों में इसके शिक्षक और सामग्री पहले से ही मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, पंजाबी, बंगाली, तमिल और तेलुगु जैसी स्थानीय भाषाओं के लिए भी स्कूलों में नए अवसर उत्पन्न होंगे।
स्कूलों के सामने संसाधनों की चुनौती
इस नीति को लागू करना विद्यालयों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, जहां बहुभाषी छात्र होते हैं, दूसरे भारतीय भाषा का चुनाव करना और योग्य शिक्षकों की व्यवस्था करना एक कठिन कार्य साबित हो सकता है। हालांकि, शिक्षाविदों का मानना है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त होने से छात्रों पर मानसिक तनाव कम होगा और वे अपनी इच्छानुसार भाषाएं सीख सकेंगे।
