वन परिक्षेत्र dhimarkheda news ढीमरखेड़ा के अंतर्गत बीट खिरवापोड़ी में वर्ष 2017 में नर चीतल के अवैध शिकार के प्रख्यात मामले में माननीय न्यायालय ढीमरखेड़ा ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला दिया है। यह निर्णय केवल इस मामले के अभियुक्तों के लिए सजा का कारण नहीं बना बल्कि वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक स्पष्ट संदेश भी पहुँचाता है कि प्रकृति और वन्यप्राणियों के खिलाफ अपराध करने वालों को कानून के तहत कोई छूट नहीं दी जाएगी।
मामले के अनुसार 29 जनवरी 2017 को वन परिक्षेत्र ढीमरखेड़ा की बीट खिरवापोड़ी में नर चीतल के शिकार की सूचना वन विभाग को मिली थी। इस सूचना के आधार पर तत्काल कार्रवाई करते हुए वन विभाग ने अपराध क्रमांक 3057/04 के तहत मामला दायर किया। मौके पर उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और तकनीकी तथ्यों के आधार पर गहन जांच की गई, जिसमें शिकार की पुष्टि हुई और आरोपियों की संलिप्तता पाई गई।
जांच पूरी होने के बाद वन विभाग ने सभी साक्ष्यों के साथ मामला माननीय न्यायालय ढीमरखेड़ा में रखा। इसके पश्चात मामले की औपचारिक सुनवाई आरंभ हुई, जो विभिन्न चरणों से होकर लगभग आठ वर्षों तक चली। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य प्रस्तुत किए और बचाव पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का मौका मिला।
आखिरकार, 22 दिसंबर 2025 को माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ढीमरखेड़ा, पूर्वी तिवारी ने निर्णय सुनाया। न्यायालय ने सभी चारों अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए कठोर सजाओं का ऐलान किया। न्यायालय के आदेशानुसार गुलजारी पिता जगन्नाथ यादव, खिरवापोड़ी के निवासी को तीन वर्ष की कठोर सजा और 20 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया। इसी प्रकार दीपक पिता गुलजारी यादव, खिरवापोड़ी के निवासी को तीन वर्ष की जेल और 10 हजार रुपये का जुर्माना, सोनू पिता कोदूलाल भुमिया, खिरवापोड़ी के निवासी को तीन वर्ष की जेल और 10 हजार रुपये का जुर्माना तथा प्रमोद पिता बेड़ीलाल भुमिया को भी तीन वर्ष का कारावास और 10 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा दी गई।न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि वन्यप्राणियों का अवैध शिकार न केवल वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम का गंभीर उल्लंघन है, बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी घातक है। इस प्रकार के अपराधों पर कठोर दंड दिया जाना समाज में कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करता है और संभावित अपराधियों के लिए एक सख्त चेतावनी का कार्य करता है।
इस प्रकरण में वन विभाग की ओर से अभियोजन की जिम्मेदारी एड.सुश्री मंजुला श्रीवास्तव द्वारा निभाई गई। उनकी प्रभावी पैरवी, सशक्त तर्क और साक्ष्यों की सुसंगत प्रस्तुति के चलते न्यायालय आरोप सिद्ध करने में सफल रहा। रेंजर अजय मिश्रा ने इस निर्णय को विभागीय प्रयासों की बड़ी सफलता बताते हुए कहा कि यह फैसला भविष्य में अवैध शिकार की घटनाओं पर अंकुश लगाने में सहायक सिद्ध होगा।
स्थानीय स्तर पर इस निर्णय को लेकर संतोष और सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। जानकारों का मानना है कि इस प्रकार के सख्त फैसले से न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि आम नागरिकों में भी वन संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
कुल मिलाकर यह फैसला खिरवापोड़ी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे जिले और प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण के प्रति न्यायपालिका के सख्त दृष्टिकोण को दर्शाता है और यह संदेश देता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
