सुबह से कई महिलाएँ भूखी बैठी हुई थीं, शाम को एक असाधारण जनसैलाब उमड़ आया, हर वर्ग ने एकजुट होकर कहा: अब जिला की घोषणा किए बिना संघर्ष बंद नहीं होगा। सिहोरा जिला आंदोलन का दूसरा दिन एक बार फिर से जनता की एकता, क्रोध और मजबूत संकल्प का मजबूत प्रतीक बन गया। सुबह से पुराने बस स्टैंड पर क्रमिक भूख हड़ताल में बैठी हुई दर्जनभर महिलाओं ने आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। महिलाओं के इस बलिदान और सहनशीलता को देखकर पूरे सिहोरा में आंदोलन की ऊर्जा कई गुना बढ़ गई। शाम को निकली सिहोरा स्वाभिमान वाहन रैली ने सड़कों को जनसैलाब से भर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि अब सिहोरा अपने अधिकारों के लिए किसी भी स्थिति में पीछे नहीं हटेगा। दिन की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर तब थी जब बड़ी संख्या में सिहोरा की महिलाएँ पहली बार आंदोलन के मंच पर क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठीं। भोजन के बिना घंटों तक बैठकर उन्होंने जिले की मांग को नए स्वर और नई ऊर्जा के साथ उठाया। महिलाओं के इस संघर्ष ने समाज के मन में यह विश्वास पैदा किया कि अब आंदोलन सामाजिक रूप से और व्यापक और समावेशी हो चुका है।
दोपहर होते-होते आंदोलन स्थल पर काफी संख्या में लोग महिलाओं को समर्थन देने आए। युवा, व्यापारी, समाजसेवी, किसान, कर्मचारी और छात्र—हर वर्ग ने महिलाओं के इस प्रयास को सिहोरा के जागी हुई चेतना का प्रतीक माना। भूख हड़ताल पर बैठी रूपाली सराफ ने कहा कि सिहोरा का इतिहास बहुत गौरवमयी है, लेकिन राजनीतिक उपेक्षा ने इसे कमजोर किया है। उन्होंने कहा कि यह कभी मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी तहसील हुआ करती थी लेकिन समय के साथ इसके हिस्से काटकर अलग तहसीलें बना दी गईं। उन्होंने बताया कि चुनाव के समय नेता हमेशा जिला बनाने का वादा करते रहे हैं, लेकिन आज तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।
सोनाली साहू ने कहा कि सिहोरा भारत के मध्य बिंदु पर स्थित है और भौगोलिक, जनसंख्या और प्रशासनिक दृष्टि से सभी मानकों पर जिला बनने की क्षमता रखता है। उन्होंने यह भी कहा कि “सिहोरा को बार-बार नजरअंदाज किया गया है, और अब यह उपेक्षा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है।”सरोज कुररिया ने उल्लेख किया कि चुनावों से पहले केंद्रीय मंत्रियों, विधायकों और विभिन्न प्रतिनिधियों ने सिहोरा को जिला बनाने का आश्वासन दिया था, लेकिन अब सभी चुप हैं। उन्होंने कहा कि जनता का धैर्य खत्म होता जा रहा है और यह सहनशीलता अब संघर्ष में बदलने लगी है।
बबीता त्रिपाठी ने कहा कि यह आंदोलन केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह गरिमा और पहचान की लड़ाई है। उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया कि सिहोरा को किसी नई राजनीतिक स्थिति के निर्माण से पहले जिला घोषित किया जाए। सरोज कुररिया, रूपाली श्रॉफ, बबीता त्रिपाठी, प्रतिभा मिश्रा, कविता सेठ, मधु प्यासी, रोशनी मिश्रा, रिचा पाठक, सोनाली साहू, शिवांगी साहू, तस्लीम बानो, संगीता विश्वकर्मा। शाम को आयोजित सिहोरा स्वाभिमान वाहन रैली अत्यंत प्रभावशाली रही। बाबाशाला से आरंभ हुई यह रैली सिहोरा-खितौला के सभी मुख्य मार्गों से होती हुई समाप्ति स्थल पर पहुँची, जो पुराने बस स्टैंड पर था। रैली में शामिल वाहनों की लंबी कतारें दूर-दूर तक फैली हुई थीं। ढोल, नारे, तिरंगे और प्लेकार्ड लेकर आए लोगों ने शहर का माहौल पूरी तरह से आंदोलनीय बना दिया।
व्यापारी संघ, सामाजिक संगठनों, युवा समूहों, कर्मचारियों, शिक्षकों, ग्रामीण क्षेत्रों से आए जत्थों और महिलाओं की संख्याबल से रैली को एक ठोस रूप मिला। भाग लेने वालों ने कहा कि अब आंदोलन पीछे नहीं हटेगा और सरकार चाहें जितना भी समय ले, जनता की मांग और अधिक तीव्र होती जाएगी। शाम को आयोजित सिहोरा स्वाभिमान वाहन रैली अत्यंत प्रभावशाली रही। बाबाशाला से आरंभ हुई यह रैली सिहोरा-खितौला के सभी मुख्य मार्गों से होती हुई समाप्ति स्थल पर पहुँची, जो पुराने बस स्टैंड पर था। रैली में शामिल वाहनों की लंबी कतारें दूर-दूर तक फैली हुई थीं। ढोल, नारे, तिरंगे और प्लेकार्ड लेकर आए लोगों ने शहर का माहौल पूरी तरह से आंदोलनीय बना दिया।
व्यापारी संघ, सामाजिक संगठनों, युवा समूहों, कर्मचारियों, शिक्षकों, ग्रामीण क्षेत्रों से आए जत्थों और महिलाओं की संख्याबल से रैली को एक ठोस रूप मिला। भाग लेने वालों ने कहा कि अब आंदोलन पीछे नहीं हटेगा और सरकार चाहें जितना भी समय ले, जनता की मांग और अधिक तीव्र होती जाएगी।
